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Shri Narayan Kavach (Also Known As: The Sixth Skanda Of The Bhagavada Purana, Chapter 8, Contains The Narayana Kavacham. It Is A Kind Of Defence Against Both Visible And Invisible Enemies. The Narayana Kavach Is A Very Condensed Stotra With Just 24 Verses. It Must Be Read At Least Once Every Day. It Doesn’t Even Take Ten Minutes. We Must First Apply Lord Vishnu To Every Part Of Our Body. This Method Is Known As Anga-nyas And Kara-nyas. A Really Straightforward Technique That May Be Learned From A Guru. Narayan Kavach Follows It.
A Potent Prayer To The Hindu God Vishnu, Narayan Kavach. The Hindi Pdf Lyrics For The Narayan Kavach Mantra Are Provided Here. Every Day In The Morning, You Should Recite The Prayer. It Is Chanted To Invoke Protection, Prosperity, And Peace.
Mantras, Or Specific Chants, Are A Powerful Form Of Worship Because They Contain The Secrets Of God’s True Nature. They Assist Us In Achieving Perfect Communion With The Creator When Said With Sincerity And Devotion. They Are Also Effective Countermeasures Against The Harmful Effects Of Black Magic And Other Occult Practises As Well As Their Evil Influences. Mantras Provide Us The Ability To Grow Supernatural Abilities, Grant Us Mental Peace, And Give Us The Fortitude To Withstand The Effects Of Hostile Forces.
The Narayana Kavach Is A Very Condensed Stotra With Just 24 Verses. It Must Be Read At Least Once Every Day. It Doesn’t Even Take Ten Minutes. We Must First Apply Lord Vishnu To Every Part Of Our Body. This Method Is Known As Anga-nyas And Kara-nyas. A Really Straightforward Technique That May Be Learned From A Guru. Narayan Kavach Follows It.
Possess Faith. Perform Sadhana. Technique Is Quite Easy. Spend A Few Minutes Each Day On Yourself. Be Favoured With Outstanding Outcomes. Even If Your Sadnana Has Any Undiscovered Flaws, Nothing Bad Happens. When The Demons Acquired Enormous Power Via The Study Of Unique Mantras From Their Spiritual Leader Sukracharya, Indra And The Other Devas Sought The Advice Of A Learned Man Named Viswarupa, Learned Equally Powerful Chants, And Regained The Status They Had Previously Lost. The Three Specific Mantras In Praise Of God Are Included In The “Narayana Kavacham,” Which The Purohit Taught Them. It Was Armour That Provided Eternal Protection Against Attack From All Directions, Also Known As The “Vaishnavi Vidya.” One Was Redeemed From All Ills And Sins By Its Repetition.
The Detailed Account Of The Narayana Kavacham’s Efficacy Included A Description Of The Minimal Daily Rites That Were Expected Of One As Well As A Summary Of The Ten Incarnations Of God. The Avataras Were Included In The Verses, And Reciting Them Would Ward Off All Evil Forces. For Instance, Meditating On Sri Narasimha Or Sri Rama While Travelling Can Enable You To Face Any Danger And Get General Protection.
A Brahmin Named Kaushik Had Devotedly Practised “Narayana Kavach” In The Past. He Made A Sincere Effort To Follow The Yoga Path. And Finally, He Dumped His Body In A Desert.
A Gandharva By The Name Of Chitrarath Flew Via An Aeroplane Above And Above The Skeletal Remains Of The Kaushik. The Moment The Air Plane’s Shadow Touched Chitrarath’s Bones, The Plane Crashed And He Fell To The Ground. He Was Unable To Move Because His Joints Were Painful.
A Wise Man Named Valakhilya Happened To See Chitrarath’s Suffering And, Out Of Compassion, He Told Him That Narayana Kavach, The Most Potent Phenomenon, Was The Cause Of It. You Pray While Submerging Kaushik’s Remains In A River. You’ll Get Pain Relief. – – – – –
Demons Once Gained Enormous Strength While Being Protected By Their Guru Under Peculiar Circumstances. As Their King, Indra Humiliated Guru Brihaspathi And Lost The Protection Of The Guru, The Demi-gods Weakened. Sage Viswaroopa Was Then Approached By The Gods. Indra The Great Narayana Kavach Was Initiated By Him. Indra Regained Their Lost Strength As A Result, And He Subdued The Demons.
।।राजोवाच।।
यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहान् रिपुसैनिकान्।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम्।।१
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम्।
यथाssततायिनः शत्रून् येन गुप्तोsजयन्मृधे।।२
राजा परिक्षित ने पूछाः भगवन् ! देवराज इंद्र ने जिससे सुरक्षित होकर शत्रुओं की चतुरङ्गिणी सेना को खेल-खेल में अनायास ही जीतकर त्रिलोकी की राज लक्ष्मी का उपभोग किया, आप उस नारायण कवच को सुनाइये और यह भी बतलाईये कि उन्होंने उससे सुरक्षित होकर रणभूमि में किस प्रकार आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त की ।।१-२
।।श्रीशुक उवाच।।
वृतः पुरोहितोस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु।।३
श्रीशुकदेवजी ने कहाः परीक्षित् ! जब देवताओं ने विश्वरूप को पुरोहित बना लिया, तब देवराज इन्द्र के प्रश्न करने पर विश्वरूप ने नारायण कवच का उपदेश दिया तुम एकाग्रचित्त से उसका श्रवण करो ।।३
विश्वरूप उवाचधौताङ्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदङ् मुखः।
कृतस्वाङ्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः।।४
नारायणमयं वर्म संनह्येद् भय आगते।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरूदरे हृद्यथोरसि।।५
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत्।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा।।६
विश्वरूप ने कहा – देवराज इन्द्र ! भय का अवसर उपस्थित होने पर नारायण कवच धारण करके अपने शरीर की रक्षा कर लेनी चाहिए उसकी विधि यह है कि पहले हाँथ-पैर धोकर आचमन करे, फिर हाथ में कुश की पवित्री धारण करके उत्तर मुख करके बैठ जाय इसके बाद कवच धारण पर्यंत और कुछ न बोलने का निश्चय करके पवित्रता से “ॐ नमो नारायणाय” और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इन मंत्रों के द्वारा हृदयादि अङ्गन्यास तथा अङ्गुष्ठादि करन्यास करे पहले “ॐ नमो नारायणाय” इस अष्टाक्षर मन्त्र के ॐ आदि आठ अक्षरों का क्रमशः पैरों, घुटनों, जाँघों, पेट, हृदय, वक्षःस्थल, मुख और सिर में न्यास करे अथवा पूर्वोक्त मन्त्र के यकार से लेकर ॐ कार तक आठ अक्षरों का सिर से आरम्भ कर उन्हीं आठ अङ्गों में विपरित क्रम से न्यास करे ।।४-६
करन्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्यया।
प्रणवादियकारन्तमङ्गुल्यङ्गुष्ठपर्वसु।।७
तदनन्तर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” इस द्वादशाक्षर -मन्त्र के ॐ आदि बारह अक्षरों का दायीं तर्जनी से बाँयीं तर्जनी तक दोनों हाँथ की आठ अँगुलियों और दोनों अँगुठों की दो-दो गाठों में न्यास करे।।७
न्यसेद् हृदय ओङ्कारं विकारमनु मूर्धनि।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत्।।८
वेकारं नेत्रयोर्युञ्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः।।९
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत्।
ॐ विष्णवे नम इति ।।१०
फिर “ॐ विष्णवे नमः” इस मन्त्र के पहले के पहले अक्षर ‘ॐ’ का हृदय में, ‘वि’ का ब्रह्मरन्ध्र , में ‘ष’ का भौहों के बीच में, ‘ण’ का चोटी में, ‘वे’ का दोनों नेत्रों और ‘न’ का शरीर की सब गाँठों में न्यास करे तदनन्तर ‘ॐ मः अस्त्राय फट्’ कहकर दिग्बन्ध करे इस प्रकर न्यास करने से इस विधि को जानने वाला पुरूष मन्त्रमय हो जाता है ।।८-१०
आत्मानं परमं ध्यायेद ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम्।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत ।।११
इसके बाद समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान और वैराग्य से परिपूर्ण इष्टदेव भगवान् का ध्यान करे और अपने को भी तद् रूप ही चिन्तन करे तत्पश्चात् विद्या, तेज, और तपः स्वरूप इस कवच का पाठ करे ।।११
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां न्यस्ताङ्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे।
दरारिचर्मासिगदेषुचापाशान् दधानोsष्टगुणोsष्टबाहुः ।।१२
भगवान् श्रीहरि गरूड़जी के पीठ पर अपने चरणकमल रखे हुए हैं, अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ उनकी सेवा कर रही हैं आठ हाँथों में शंख, चक्र, ढाल, तलवार, गदा, बाण, धनुष, और पाश (फंदा) धारण किए हुए हैं वे ही ओंकार स्वरूप प्रभु सब प्रकार से सब ओर से मेरी रक्षा करें।।१२
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगणेभ्यो वरूणस्य पाशात्।
स्थलेषु मायावटुवामनोsव्यात् त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ।।१३
मत्स्यमूर्ति भगवान् जल के भीतर जलजंतुओं से और वरूण के पाश से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान् स्थल पर और विश्वरूप श्री त्रिविक्रमभगवान् आकाश में मेरी रक्षा करें 13
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः पायान्नृसिंहोऽसुरयुथपारिः।
विमुञ्चतो यस्य महाट्टहासं दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ।।१४
जिनके घोर अट्टहास करने पर सब दिशाएँ गूँज उठी थीं और गर्भवती दैत्यपत्नियों के गर्भ गिर गये थे, वे दैत्ययुथपतियों के शत्रु भगवान् नृसिंह किले, जंगल, रणभूमि आदि विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें ।।१४
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोsव्याद् भरताग्रजोsस्मान् ।।१५
अपनी दाढ़ों पर पृथ्वी को उठा लेने वाले यज्ञमूर्ति वराह भगवान् मार्ग में, परशुराम जी पर्वतों के शिखरों और लक्ष्मणजी के सहित भरत के बड़े भाई भगावन् रामचंद्र प्रवास के समय मेरी रक्षा करें ।।१५
मामुग्रधर्मादखिलात् प्रमादान्नारायणः पातु नरश्च हासात्।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः पायाद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ।।१६
भगवान् नारायण मारण – मोहन आदि भयंकर अभिचारों और सब प्रकार के प्रमादों से मेरी रक्षा करें ऋषिश्रेष्ठ नर गर्व से, योगेश्वर भगवान् दत्तात्रेय योग के विघ्नों से और त्रिगुणाधिपति भगवान् कपिल कर्मबन्धन से मेरी रक्षा करें ।।१६
सनत्कुमारो वतु कामदेवाद्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात्।
देवर्षिवर्यः पुरूषार्चनान्तरात् कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ।।१७
परमर्षि सनत्कुमार कामदेव से, हयग्रीव भगवान् मार्ग में चलते समय देवमूर्तियों को नमस्कार आदि न करने के अपराध से, देवर्षि नारद सेवापराधों से और भगवान् कच्छप सब प्रकार के नरकों से मेरी रक्षा करें ।।१७
धन्वन्तरिर्भगवान् पात्वपथ्याद् द्वन्द्वाद् भयादृषभो निर्जितात्मा।
यज्ञश्च लोकादवताज्जनान्ताद् बलो गणात् क्रोधवशादहीन्द्रः ।।१८
भगवान् धन्वन्तरि कुपथ्य से, जितेन्द्र भगवान् ऋषभदेव सुख-दुःख आदि भयदायक द्वन्द्वों से, यज्ञ भगवान् लोकापवाद से, बलरामजी मनुष्यकृत कष्टों से और श्रीशेषजी क्रोधवशनामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें ।।१८
द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद् बुद्धस्तु पाखण्डगणात् प्रमादात्।
कल्किः कले कालमलात् प्रपातु धर्मावनायोरूकृतावतारः ।।१९
भगवान् श्रीकृष्णद्वेपायन व्यासजी अज्ञान से तथा बुद्धदेव पाखण्डियों से और प्रमाद से मेरी रक्षा करें धर्म-रक्षा करने वाले महान अवतार धारण करने वाले भगवान् कल्कि पाप-बहुल कलिकाल के दोषों से मेरी रक्षा करें ।।१९
मां केशवो गदया प्रातरव्याद् गोविन्द आसङ्गवमात्तवेणुः।
नारायण प्राह्ण उदात्तशक्तिर्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ।।२०
प्रातःकाल भगवान् केशव अपनी गदा लेकर, कुछ दिन चढ़ जाने पर भगवान् गोविन्द अपनी बांसुरी लेकर, दोपहर के पहले भगवान् नारायण अपनी तीक्ष्ण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान् विष्णु चक्रराज सुदर्शन लेकर मेरी रक्षा करें ।।२०
देवोsपराह्णे मधुहोग्रधन्वा सायं त्रिधामावतु माधवो माम्।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे निशीथ एकोsवतु पद्मनाभः ।।२१
तीसरे पहर में भगवान् मधुसूदन अपना प्रचण्ड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सांयकाल में ब्रह्मा आदि त्रिमूर्तिधारी माधव, सूर्यास्त के बाद हृषिकेश, अर्धरात्रि के पूर्व तथा अर्ध रात्रि के समय अकेले भगवान् पद्मनाभ मेरी रक्षा करें ।।२१
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः प्रत्यूष ईशोऽसिधरो जनार्दनः।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ।।२२
रात्रि के पिछले प्रहर में श्रीवत्सलाञ्छन श्रीहरि, उषाकाल में खड्गधारी भगवान् जनार्दन, सूर्योदय से पूर्व श्रीदामोदर और सम्पूर्ण सन्ध्याओं में कालमूर्ति भगवान् विश्वेश्वर मेरी रक्षा करें ।।२२
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमासु कक्षं यथा वातसखो हुताशः ।।२३
सुदर्शन ! आपका आकार चक्र ( रथ के पहिये ) की तरह है आपके किनारे का भाग प्रलयकालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् की प्रेरणा से सब ओर घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला डालती है, वैसे ही आप हमारी शत्रुसेना को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिये, जला दीजिये ।।२३
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिङ्गे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ।।२४
कौमुद की गदा ! आपसे छूटने वाली चिनगारियों का स्पर्श वज्र के समान असह्य है आप भगवान् अजित की प्रिया हैं और मैं उनका सेवक हूँ इसलिए आप कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और प्रेतादि ग्रहों को अभी कुचल डालिये, कुचल डालिये तथा मेरे शत्रुओं को चूर – चूर कर दिजिये ।।२४
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन् ।।२५
शङ्खश्रेष्ठ ! आप भगवान् श्रीकृष्ण के फूँकने से भयंकर शब्द करके मेरे शत्रुओं का दिल दहला दीजिये एवं यातुधान, प्रमथ, प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस आदि भयावने प्राणियों को यहाँ से तुरन्त भगा दीजिये ।।२५
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्यमीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि।
चर्मञ्छतचन्द्र छादय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् २६
भगवान् की श्रेष्ठ तलवार ! आपकी धार बहुत तीक्ष्ण है आप भगवान् की प्रेरणा से मेरे शत्रुओं को छिन्न-भिन्न कर दिजिये। भगवान् की प्यारी ढाल ! आपमें सैकड़ों चन्द्राकार मण्डल हैं आप पापदृष्टि पापात्मा शत्रुओं की आँखे बन्द कर दिजिये और उन्हें सदा के लिये अन्धा बना दीजिये ।।२६
यन्नो भयं ग्रहेभ्यो भूत् केतुभ्यो नृभ्य एव च।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य एव वा ।।२७
सर्वाण्येतानि भगन्नामरूपास्त्रकीर्तनात्।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतीपकाः ।।२८
सूर्य आदि ग्रह, धूमकेतु (पुच्छल तारे ) आदि केतु, दुष्ट मनुष्य, सर्पादि रेंगने वाले जन्तु, दाढ़ोंवाले हिंसक पशु, भूत-प्रेत आदि तथा पापी प्राणियों से हमें जो-जो भय हो और जो हमारे मङ्गल के विरोधी हों – वे सभी भगावान् के नाम, रूप तथा आयुधों का कीर्तन करने से तत्काल नष्ट हो जायें ।।२७-२८
गरूड़ो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ।।२९
बृहद्, रथन्तर आदि सामवेदीय स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की जाती है, वे वेदमूर्ति भगवान् गरूड़ और विष्वक्सेनजी अपने नामोच्चारण के प्रभाव से हमें सब प्रकार की विपत्तियों से बचायें।।२९
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः।
बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पान्तु पार्षदभूषणाः ।।३०
श्रीहरि के नाम, रूप, वाहन, आयुध और श्रेष्ठ पार्षद हमारी बुद्धि , इन्द्रिय , मन और प्राणों को सब प्रकार की आपत्तियों से बचायें ।।३०
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सद्सच्च यत्।
सत्यनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपाद्रवाः ।।३१
जितना भी कार्य अथवा कारण रूप जगत है, वह वास्तव में भगवान् ही है इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे उपद्रव नष्ट हो जायें ।।३१
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।
भूषणायुद्धलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ।।३२
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ।।३३
जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टि में भगवान् का स्वरूप समस्त विकल्पों से रहित है-भेदों से रहित हैं फिर भी वे अपनी माया शक्ति के द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियों को धारण करते हैं यह बात निश्चित रूप से सत्य है इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा -सर्वत्र सब स्वरूपों से हमारी रक्षा करें ।।३२-३३
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्तादन्तर्बहिर्भगवान् नारसिंहः।
प्रहापयँल्लोकभयं स्वनेन ग्रस्तसमस्ततेजाः ।।३४
जो अपने भयंकर अट्टहास से सब लोगों के भय को भगा देते हैं और अपने तेज से सबका तेज ग्रस लेते हैं, वे भगवान् नृसिंह दिशा -विदिशा में, नीचे -ऊपर, बाहर-भीतर – सब ओर से हमारी रक्षा करें ।।३४
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारयणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ।।३५
देवराज इन्द्र ! मैने तुम्हें यह नारायण कवच सुना दिया है इस कवच से तुम अपने को सुरक्षित कर लो बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य – यूथपतियों को जीत कर लोगे ।।३५
एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।
पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ।।३६
इस नारायण कवच को धारण करने वाला पुरूष जिसको भी अपने नेत्रों से देख लेता है अथवा पैर से छू देता है, तत्काल समस्त भयों से से मुक्त हो जाता है 36
न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ।।३७
जो इस वैष्णवी विद्या को धारण कर लेता है, उसे राजा, डाकू, प्रेत, पिशाच आदि और बाघ आदि हिंसक जीवों से कभी किसी प्रकार का भय नहीं होता ।।३७
इमां विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयन् द्विजः।
योगधारणया स्वाङ्गं जहौ स मरूधन्वनि ।।३८
देवराज! प्राचीनकाल की बात है, एक कौशिक गोत्री ब्राह्मण ने इस विद्या को धारण करके योगधारणा से अपना शरीर मरूभूमि में त्याग दिया ।।३८
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा।
ययौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृतो यत्र द्विजक्षयः ।।३९
जहाँ उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था, उसके उपर से एक दिन गन्धर्वराज चित्ररथ अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठ कर निकले ।।३९
गगनान्न्यपतत् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ।।४०
वहाँ आते ही वे नीचे की ओर सिर किये विमान सहित आकाश से पृथ्वी पर गिर पड़े इस घटना से उनके आश्चर्य की सीमा न रही जब उन्हें बालखिल्य मुनियों ने बतलाया कि यह नारायण कवच धारण करने का प्रभाव है, तब उन्होंने उस ब्राह्मण देव की हड्डियों को ले जाकर पूर्ववाहिनी सरस्वती नदी में प्रवाहित कर दिया और फिर स्नान करके वे अपने लोक को चले गये ।।४०
।।श्रीशुक उवाच।।
य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चादृतः।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ।।४१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं – परिक्षित् जो पुरूष इस नारायण कवच को समय पर सुनता है और जो आदर पूर्वक इसे धारण करता है, उसके सामने सभी प्राणी आदर से झुक जाते हैं और वह सब प्रकार के भयों से मुक्त हो जाता है ।।४१
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्यऽमृधेसुरान् ।।४२
परीक्षित् ! शतक्रतु इन्द्र ने आचार्य विश्वरूपजी से यह वैष्णवी विद्या प्राप्त करके रणभूमि में असुरों को जीत लिया और वे त्रैलोक्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगे 42
।।इति श्रीनारायणकवचं सम्पूर्णम्।।
( श्रीमद्भागवत स्कन्ध 6 , अ। 8 )
Yaya guptha sahasraksha savaahaan ripu sainikan, Kreedanniva vinirjithya trilokya bhubhuje sriyam., 1 Bhagawam sthan mamakhyahi varma narayanathmakam, Yadha athathayina shathroon yena guptho jayan mrudhe., 2
Oh God please share with me that armour of Narayana,
By which the thousand eyed Indra was able to drive away,
The well armed soldiers of his enemy as if it is a play,
And gain control of the three worlds and wealth,
And also was safe in the battle field and became victorious.
Vrutha, purohitha thwashtro mahendra yanu pruchathe, Narayanakhyam varmaha thadihaika mana srunu., 3
Viswaroopa the son of Thwashtra, when he was made,
The priest Of Indra taught him this armour of Narayana,
And I will teach you that and please listen to it with concentration.
Dhouthangri panir achamya sapavithra udang mukha, Kruthaswa anga kara nyaso manthrabhyam vagyatha suchi., 4 Narayana mayam varma sannahyedh bhaya agathe, Daiva bhoothathma karmebhya narayana maya puman., 5 Padyor janu noruvor udhare hrudhyadhorasi, Mukhe sirasya anu poorva omgaradheeni vinyaseth., 6
When fear approaches you, after washing your feet and hand,
Do internal purification by achamana, wear the holy ring made of Durba,
Face the north, sit on a seat of Durba grass and do the hand Symbols,
And do holy chants and attain cleanliness of speech.
You should then become silent, become engrossed in Narayana,
And do suitable actions to tie yourself with the armour of Narayana,
And using the eight letters starting with Om, touch the feet,
Knees, thighs, belly heart chest, face and head,
Om namo narayanethi viparyaya madhapi vaa, Kara nyasam Thatha kuryad dwadasakshara vidhyaya., 7 Pranavadhi yakarandha mangulyam angushta parvasu, Nyased drudaya omkaram vikara manu moordhani., 8
Then after touching the eight parts of the body,
The feet, Knees, thighs, belly heart chest, face and head,
Chanting the eight letter Manthra “Om Namo Narayanaya”
Either in an ascending or descending order,
You have to perform the knowledge of the twelve letters,
Shakaranthu brovor madhye nakaram shikhayam nyased, Vekaram nethrayor yunjyannakaram sarva sandhishu., 9 Makara masthra mudhisya mantha moorthir bhaved budha, Sarva sanga shadantham thath sarva dikshu vinirdisheth, Om Vishnava nama ithi., 10
Tell “Sha” and touch the middle of the eye brows,
Tell “Na” and touch the top of the hair on your head
Tell “Ve” and touch both your eyes,
Tell “Na” and touch all your joints,
Facing all directions and say “Ma Asthraya Phat”,
This would make even the dim witted in to a wise one,
And thus you tie all the six directions as directed,
And chant “Om salutations to Lord Vishnu”
Athmanam paramam dhyeyed dhyeyam shad shakthibhir yudham, Vidhya thejas thapo murthim imam manthra mudhahareth., 11
Afterwards meditate on Athma supported by the six strengths,
Of Wealth, charity, fame, goddess of wealth, wisdom and renunciation,
And chant the following which has the form of knowledge, power and meditation.
Om harir vidhadhyan mama sarva raksham. Nyashngir padma padgendra prushte, Dharari charmasi gadheshu chapa, Pasan dadhano ashtaguno ashta bahu., 12
May all the protection to me be given by Hari,
Who keeps his lotus feet on the back of the bird,
Who is armed with conch, wheel, sword, mace,
Bow and a rope and who has eight qualities and eight hands.
Jaleshu maam rakshathu mathsya moorthir, Yadho ganebhyo varunasya pasad, Sthaleshu maya vatu vamano avyal, Trivikrama khevadu viswaroopa., 13
Let me be protected in the water by Fish incarnation,
From the animals of the sea and rope of Varuna,
Let me be protected in the Land by Vamana, the illusory boy,
And in the sky Trivikrama and viswaroopa forms.
Durgesh atavyaji mukhadhishu Prabhu, Payanrusimho asura yoodha pari, Vimunchatho yasya mahattahasam, Dhiso vinedhur anya pathangascha Garbha., 14
In forts, forests, dangerous places and in war,
Let me be protected by Lord Narasimha,
Who by his mighty roar shook all directions,
Broke open the army formation of Asura,
And caused pregnant asura Women to abort.
Rakshathwasou maadhwani Yajna Kalpa, Swadamshtrayoth patha dharo varaha, Ramo aadhrikooteshwadha vipravase, Sa lakshmanovyadh bharathagrajo maam., 15
Let me be protected on my way by Lord Varaha,
Who is Yagna personified and who by his protruding teeth,
Lifted and carried the earth to safety,
Let me be protected on mountain top by Lord Parasurama
Let me be protected when I am abroad By Lord Rama,
Who is elder brother of Bharatha and Lakshmana.
Mamugra dharmad akhilath pramadath, Narayana pathu narascha hasath, Dathaswa yogad adha Yoga natha, Payadh Gunesa kapila Karma bandath., 16
Let me be protected by Lord Narayana,
When I am transgressing Dharma or committing mistakes,
Let me be protected from my pride by Sage Nara,
Let me protected by Sage Dathathreya,
For not engaging in Yoga, meditation and other activities
And let sage Kapila protect me from the bondage of Karma.
Sanath kumaro aavathu Kama devath, Hayanano maam padhi deva helanath, Devarshi varya purusharcha nantharath, Koormo harir maam nirayadh aseshath., 17
Let sage Sanath Kumara protect me from the cupid,
Let Lord Hayagreeva protect me while I am on travel,
As well as when I do action that insults the Devas,
Let Sage Narada protect me from sins of non worship of devas,
And let Hari who took the form of a tortoise,
Protect me from different types of hell.
Dhanwandarir bhagawan pathway padhyath, Dwandwadh bhayad rushabho nirjithama, Yajnascha loka devathaa janandath, Balo ganath krodha vasadh aheendra., 18
Let Lord Dhanwanthari protect me from unsuitable food,
Let Rishabha, the renounced soul protect me.
From fear of the contradictory dualities[3],
Let Sage Yajna protect me from gossip of society,
Let Lord Balarama protect me from problems created by men,
And let Adhi sesha protect me from my anger.
Dwaipayano bhagwan aprabhodhad, Budhasthu pashanda ganath pramadhath,, Kalki kale kala malath prapath, Dharma vanayoru kruthavathara., 19
Let Sage Vyasa protect me from lack of awakening,
Let sage Budha protect me from hypocrisy and ignorance,
Let Lord Kalki, who would be born to salvage Dharma,
Protect me from the evil effects and thoughts of Kali age.
Maam kesavo gadhaya pratharavyad, Govinda aasangava aartha venu, Narayana prahana udatha shakthir, Madhyandhine vishnurareendra pani., 20
May I be protected in the morn by Kesava with his mace,
May I be protected two hours later By Govinda by his flute,
Two more hours later let Lord Narayana protect by his strength,
And at noon let Lord Vishnu protect me his holy wheel.
Devo aparahne Madhu hogra dhanwa, Sayam thridhamavathu Madhwao maam, Doshe Hrishi kesa, uthardha rather, Niseedha yekovathu Padmanabha., 21
After noon let me protected by Madhu with his great bow,
In the evening Let Madhwa in the form of trinity protect me,
Between dawn and midnight let Lord Hrishi kesa protect me,
And at midnight let Lord Padmanabha alone protect me.
Srivathsa dhamaapara rathra eesa, Prathyoosha eesosidharo janardhana, Dhamodharo avyad anusandhyam prabathe, Visweswaro bhagwan kala moorthi., 22
Let me protected by remaining part of the night,
By the Lord in whom Srivathsa lives,
Let me be protected just before dawn,
By Lord Janardhana who holds the sword,
Let me be protected at sun rise,
By Lord Damodara and just before morn,
Let Lord Visweshwara give me protection.
Chakram yugantha analathigma nemi, Bhramath samanthad Bhagvath prayuktham, Dandhagdhi dangdhyari sainya masu, Kaksham yadha vatha sakho huthasa., 23
Oh holy Wheel,your edges are like the raging fire of deluge,
You are sent by the God and rotate and travel everywhere,
And so like the fire with the help of wind,
Burns in to ashes the dried up wood of a forest,
Speedily and speedily burn and burn all my enemies.
Gadhe asani sparsana visphulinge, Nishpindi nishpindyajitha priyasi, Koosmanda vainayaka yaksha raksho, Bhootha graham choornaya choornyarin., 24
Oh mace, the spark raising touches of yours,
Are unbearable like the touch of Vajra,
And you are dear to the invincible lord and his servant,
And so please powder and powder again,
Evil spirits, Yakshas, Rakshasas and all my enemies.
Thwam yathu dhana pramadha pretha mathru, Pisacha vipra graham gora drushteen, Dharendra vidhravaya Krishna pooritho, Bhima swano arer hrudhayani kambhayan., 25
Oh Conch, when Lord Krishna blows in you,
You create a huge and loud Sound and confuse my enemies,
And drive away ghouls, devils, ghosts, Pramadhas,
Brahma Rakshas and other fearful beings.
Thwam thigma dharasi varari sainyam, Eesa prayuktha mama chindhi, chindhi, Chakshoomshi charman satha chandra chadhaya, Dwishamaghonaam hara papa chakshusham., 26
Oh holy sword, Be sent by the Lord himself,
And cut and cut my enemy army in to pieces,
Oh shield of the lord,shining like hundred moons,
Please make my enemies with full of sins look blind.
Yanna bhayam grahebhyobhooth kethubhyo nrubhya eva cha, Saree srupebhyo dhamshtribhyo bhoothabyohebhya yeva cha., 27 Sarvanyethani bhagavan nama roopasthra keerthanath, Prayanthu samkshayam sadhyo ye na sreya pratheepika., 28
The fear that we have due to planets, comets, Kethu and kings,
The fear that we had from teethed serpents, ghosts and from sin,
And the fear that prevent our well being may all be destroyed,
Oh God, by the praise of your names and weapons.
Garudo Bhagawan sthothra sthobha chandho maya Prabhu, Rakshathwa sesha kruchsrebhyo vishwaksena swa namabhi., 29
The Garuda, who is being praised by great musical stotras of Vedas,
Who is a god and the lord of the world, may protect me from all troubles,
By singing of his names as well as that of the Lord Vishwak sena.
Savapadbhyo harer nama roopayanaayudhani na. Budheendriya mana praanan paanthu parshadha bhooshana., 30
Let the names and forms of Vishnu, his steed,
His weapons, and important assistants may protect,
My mind, senses and soul, from all the dangers and sins.
Yadhahi bhagwan eva vasthutha sad sachayath, Sathye nanena na sarve yanthu nasamupadrawa., 31
The truth that God is all beings and things,
May destroy all the troubles that we face.
Yadaikathmanu bhavanam vikalpa rahitha swayam, Bhooshanuyudha lingakhya dathe shakthi swa mayaya., 32 Thenaiva sathya manen sarvajno Bhagwan Hari, Pathu sarvai swaroopairna sada sarvathra sarvaga., 33
Those great savants who think, that God does not have any forms,
And his weapons and ornaments are only Symbols without power,
And due to this truth, the God Hari is everywhere,
And let him protect me always and everywhere.
Vidikshu dikshoordhwamadha Samantha, Anthar bahir bhagwan narasimha, Praha bhayam loka bhayam swanena, Swathejasa grastha samastha theja., 34
Let the Lord Narasimha who due to his power,
Destroyed elephants, serpents and other beings
And saved Prahladha, and removed the fear of the world,,
Protect me in all directions and non directions,
Top and below, inside and outside and in all places.
Maghavan idham aakhyatham varma narayanathmakam, Vijeshya syanjasa yena damsitho sura yoodhapan., 35
Oh Indra, thus I have told you, the great armour of Narayana,
And using this you protect yourselves and easily,
Defeat the commanders of the army of Rakshasas.
Yethad dharayamanasthu yam yam pasyathi chakshusha, Pada vaa samsprusethsadhya saadvasath sa vimuchyathe., 36
If he who wears his armour sees any one by his eyes,
Or even touches him by his feet, that man,
Would be able to get rid of all his fears.
Na kuthaschid bhayam thasya vidhyam dharayatho bhaved., Raja dasyu grahadhebhyo vyagradhibhyascha karhichith., 37
He who wears this armour will never have any fear,
From king, enemies, planets and animals like the tiger.
Imam vidhyam pura kaschid kaushiko dharayan dwija, Yogadharanaya swa angam jahow marudhanwani., 38
Long time ago, this knowledge was worn by a Brahmin,
From Koushika Gothra and he gave up his life in a desert
Thasyopari vimanena gandharwa pathi rekhadha, Yayou chithra radha sthreebhir vrutho yathra dwijakshaya., 39
A gandharwa called Chithra radha was travelling in a plane.
Along with his ladies, where the Brahmins body was lying.
Gagamam anya pada sadhya savimano hyavak sira, Sa balakhilya vachanad asthhenyadhya vismitha, Prasya prachee saraswathyam snathwa dhama swa manwagadh., 40
At that spot his plane stopped and he fell there along with his ladies,
And he was perplexed and was advised by the sages called Balakhilya,
And obeying their advice, took the bones of the Brahmin,
And put it in the river Saraswathi, took bath and went back to his home.
Ya idham srunuyath kale yo dharayathi chadhrutha, Tham namasyanthi bhoohani muchyathe sarvatho bhayath., 41 Yetham vidhyamadhi gatho viswaroopa chatha kruthu, Trilokya lakshmeem bubhuje vinirjithya mrude asuran., 42
He who wears or hears this armour of Narayana,
Would be saluted by all beings and he would get rid of all fears.
Learning this knowledge from Viswaroopa, Indra,
Won in the battle over all asuras and,
Got the blessings of wealth of the three worlds,
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